Family court me shadi ki Salgirah
वक़्त का खेल भी ग़ज़िब खलाड़ी नकला, जसि दन दीये जले थे—उसिी दन अदालत बुला बैठा। कहो तो ज़िरा, क्या कभी कसिी ने अपनी ए नवसिर्थरी फ़ै मली को र्थ में मनाई है? मोमबत्ती की जगह फ़ाइल, केक की जगह तारीख़ि, और “सिाथ नभाने” की क़सिम आज गवाही में बदल गई है। हाँ… मैं आया हूँ। थोड़ा दुख भी है— आ ख़िर इंसिान हूँ, पत्थर नहीं। पर मानो या न मानो, इसि पूरे तमाशे में एक अजीब-सिा थ्रिल भी है— क्यों क यह सिब इसिी दन हुआ है। जसि दन र ते बने थे, उसिी दन उनकी परीक्षा भी हो रही है।
वाह रे वक़्त! तू भी कमाल का लेखक है— कॉमेडी में ट्रै जेडी, और ट्रै जेडी में व्यंग्य घुसिेड़ दे ता है। मुझ पर इल्ज़िाम बसि इतना है— क मैंने बदलना नहीं सिीखा। इसि दौर में वफ़ादार होना सिबसिे बड़ा अपराध है,
और अदालतें उसिकी सिज़िा तय करती हैं। फिर भी मुस्कुरा रहा हूँ— क्यों क कहानी अजीब है, मगर करदार आज भी सिीधा है। और अगर ज़िंदगी ने पूछा— “आज क्या सिे लब्रे कया?” तो कहूँगा: आज वफ़ा की सिाल गरह थी… लोकेशन बसि थोड़ी बदल गई।
उसि दन कैलेंडर ने कुछ नहीं कहा, पर ज़िंदगी ने बहुत कुछ लख दया। तारीख़ि वही थी— जसि दन कभी सिात फिेरे पूरे हुए थे, जसि दन मंत्रों के बीच दो लोगों ने एक-दूसिरे को सिफ़र्थ सिाथी नहीं, उत्तरदा यत्व माना था। हवा में आज भी शहनाई की हल्की-सिी स्मृ त थी, पर रास्ता फिूलों की सिेज की ओर नहीं, अदालत की सिी ढ़यों की ओर जाता था। वह आदमी— सिाफ़ कपड़ों में, सिीधी रीढ़ के सिाथ, हाथ में फ़ाइल लए खड़ा था। चेहरे पर न शकवा, न शोर, बसि एक ठहरी हुई शां त— जैसिे भीतर कोई युद्ध जीत चुका हो। दुख था। क्यों क प्रेम आसिान नहीं होता जब उसिे नभाया जाए। और थ्रिल भी था— क्यों क सिच के सिाथ खड़े होने में हमेशा थोड़ी आग होती है। वह जानता था, आज का दन कोई सिाधारण दन नहीं। आज परीक्षा थी— भावनाओं की नहीं, च रत्र की। यह कहानी प्रेम के ू ने की नहीं है,
यह कहानी पुरुषाथर्थ के खड़े रहने की है। धमर्थ— क्यों क उसिने वचन को सिौदे में नहीं बदला। अथर्थ— क्यों क उसिने सिही को चुना, भले ही कीमत चुकानी पड़ी। काम— क्यों क उसिने प्रेम को भोग नहीं, कतर्थव्य सिमझा। और मोक्ष— क्यों क सिच के सिाथ खड़े होकर मन को मुक्त कर लया। आज जब लोग पूछते हैं— “इतना सिब झेलकर भी तुम ू े क्यों नहीं?” तो वह मुस्कुरा कर कहता है— “क्यों क मैं हारने नहीं, खुद को बचाने गया था।” यह कहानी कसिी अदालत की नहीं, यह कहानी उसि आदमी की है जो जानता है— हालात बदल सिकते हैं, तारीख़ि बदल सिकती है, र ते बदल सिकते हैं… पर नष्ठा अगर बची रहे, तो इंसिान कभी नहीं हारता।
Author-
Sheevum Goel
