कहानी — “ मैं, उम्मीद और वो ” कभी कभी, रातें इतनी लंबी हो जाती हैं क नींद भी थक कर दरवाज़िे पर बैठ जाती है
कभी सोचा था क खुद को कसी के लिए इतनी जगह दे दूं गा, जैसे अपनी पूरी दु नया उसके हाथों में रख दूं ।
पर अब, मुझे लगता है, वो जो कया, शायद एक बहुत बड़ी गलती थी। ये ददर्थ तो एक स्थायी एहसिासि बन चुका है, जैसिे कसिी घाव का भरना नहीं, हर दन और गहरा होना।
ैं टू टा हूँ, बखरा हूँ, और हिर रोज़ थोड़ा और गर रहिा हूँ। हिर सुबहि उठतिा हूँ, सोचतिा हूँ — आज शायद कुछ बेहितिर हिोगा, पर हिर शा वहिी पुरानिा बोझ, वहिी खाली क रा, वहिी ठं डी चाय।
कभी जसिको अपनी रूह सिे भी ज़्यादा जगह दी, वही आज सिबसिे दूर है। जसिे मैंने अपनी दु नया का मुकु बनाया, उसिी ने मेरे दल के कले में सिबसिे गहरा वार कया।
मैंने अपनी वफ़ा, अपनी पहचान, सिबकुछ उसिके नाम लख दया था — और बदले में मली तन्हाई की रसिीद।
माँ चली गई, वो भी अचानक — और उसिके दो महीने बाद, कसिी ने डां डया के ढोल पे कदम थरकाए। क्या सिच में इतना आसिान होता है भूल जाना?
मैंने खुद को खो दया, मैं ू ा हूँ, हर रोज़ि एक नया पत्थर, एक नया घाव, और हर पल मेरी आत्मा में एक नई खामोशी। माँ जब इसि दु नया सिे चली गईं, तो सिब कुछ थम सिा गया था, जैसिे हर चीज़ि रुक गई हो, जैसिे सिमय का प हया वहीं रुक गया हो। कभी मैंने सिोचा था, वह खालीपन कभी भर नहीं पाएगा, पर फिर भी, कुछ न कुछ तो था जो आगे बढ़ने की उम्मीद दे ता था। ले कन जब मैंने दे खा क वो और उसिका प रवार डां डया की मह फिलों में खोए हुए हैं, महज दो महीने बाद, जब हम सिब दुःख के सिमंदर में डू बे हुए थे, तो दल को एक और गहरा धक्का लगा।
माँ की यादें , उसिकी सिाड़ी की खुशबू, उसिकी मीठी झड़ कयाँ — सिब जैसिे मेरी सिांसिों में अ की पड़ी हैं।
और वहिाँ, कोई हि फ़िलों ें, पब्स ें, रंगों ें घुला बैठा हिै।
कभी सिोशल मी डया मेरा रंग था, मेरी आवाज़ि था — आज वो मेरे डर की वजह बन गया है।
कहीं उसिकी हँसिी दख गई, कहीं उसिके नए दोस्तों के सिाथ तस्वीरें दख गईं — डरता हूँ क कहीं फिर सिे ू न जाऊँ, और इसि बार शायद खुद को जोड़ भी न पाऊँ।
वो कैसिे अपनी ज़िंदगी को ऐसिे मस्ती में खो सिकती है? क्या उसिके दल में वही ददर्थ था, जो मैंने महसिूसि कया? क्या वह वफ़ा के शब्द, जनके लए मैंने अपना सिब कुछ दे दया, वाकई उतने सिच्चे थे? क्या यह सिब इतना आसिान होता है? क्या हमारी ज़िंदगी, मेरी नज़िरों में, सिफिर्थ एक खेल थी?
आज, 29 जून 2025 — तारीख याद रहेगी।
ले कन एक चीज़ि है, जो मुझे कभी छोड़ती नहीं। वो है एक छो ी सिी उम्मीद, जो एक कोंपल की तरह मेरी आत्मा के अंदर उगती है। कभी कभी लगता है क यह े स् है, कोई बड़ी परीक्षा है, जसिे मुझे अकेले ही पार करना है। कभी लगता है क मैं अकेला ही सिही, पर इसि अकेलेपन में ही मैं अपनी उम्मीदों को मजबूत रख सिकता हूं। एक दन, वही सिब जो मैंने खोया, वही सिब जो मुझे हक है, वह वापसि आएगा। हो सिकता है, यह वक्त मुझे बखेरने की को शश कर रहा हो, पर अंत में यह मुझे और मजबूत बना कर नकलेगा। कजर्थ बढ़ रहा है, जिम्मेदा रयां सिर पे तांडव कर रही हैं। कभी-कभी लगता है क खुद को चुप करा दूँ , पर फिर माँ की आवाज़ि कानों में गूंजती है —
" हम्मत मत हार बेटा, सब ठीक होगा।"
आज भी, भीड़ में अकेला हूँ। कभी-कभी लगता है, शायद ये कोई परीक्षा है — मेरी सिहनशीलता की, मेरे भरोसिे की, मेरी इंसिा नयत की। पता नहीं क्यों, मैं इतना अच्छा क्यों था? क्यों इतना स्पेसि दया? क्यों इतना प्यार दया?
अब लगता है — मैं ही प रवार का काला sheep हूँ, शायद सिबसिे बेवकूफि।
पर कहीं न कहीं, एक कोने में, उम्मीद की एक नन्ही सिी बाती जल रही है। वो कहती है — "रुक मत, ये वक्त है, बीत जाएगा।"
शायद मैं फिर सिे मुस्कुराऊँगा, शायद फिर सिे कोई प्यार करेगा, शायद फिर सिे आंसिुओं की जगह हँसिी लौ आए।
हाँ, मैं ू ा हूँ, पर हारा नहीं हूँ। हाँ, मैं अकेला हूँ, पर उम्मीद के सिाथ हूँ। क्यों क मैं जानता हूँ, एक दन मलेगा सिबकुछ — वो प्यार, वो इज़्ज़ित, वो मुकाम — सिब, जो मेरा हक़ है।
और उस दन, मैं अपने आप से कहूँगा — "दे ख, तू गरा भी था, टू टा भी था, पर तूने कभी उम्मीद का हाथ नहीं छोड़ा।"
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Mere Ram 🌻✨
Sheevum Goel
