माँ ने ही सिखाया था — त्योहार की असिली अह मयत, उसिके मायने, उसिका सिंस्कार, कैसिे मनाना है, और कैसिे जीना है त्योहार!
जब हम हँसिते थे, सिजते-सिँवरते थे, माँ की आँखों में तृ प्त की चमक होती थी।
आज वो सिामने नहीं, पर यकीन है — दूर कहीं सिे अब भी दे ख रही होंगी, हमारे मुस्कुराते चेहरे, हमारी था लयों में सिजे दीपों की रौशनी!
हाँ, माँ के बना त्योहार अधूरे लगते हैं, एक फिीकापन हमेशा रहेगा… पर ये वश्वासि भी उतना ही गहरा है — माँ अब भी हमारे सिाथ हैं, आशीवार्थद की तरह, परछाईं की तरह।
लव यू माँ… जहाँ भी हो, हमारे हर उत्सिव की धड़कन में बसिती हो।
- Sheevum Goel { Proud Son of Shrimati Sudha Goel }
